बंटवारे पर
बोलती बंद!
21 नवंबर को विधानसभा में भारी हंगामे के बीच उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव पास किया था।
बसपा सरकार ने पिछले साल 21 नवंबर को जब विधानसभा
में भारी हंगामे के बीच उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का
प्रस्ताव पास किया, तो लगा कि राज्य विभाजन मुख्य चुनावी मुद्दा बनेगा।
मायावती इस मुद्दे को उछालकर सपा, भाजपा, कांग्रेस और रालोद को कठघरे में
खड़ा करेंगी। प्रस्ताव पारित हुए दो माह बीत चुके हैं, लेकिन कई सालों से
सुलग रही विभाजन की आग जनता में तपिश पैदा नहीं कर सकी है। नेताओं के
भाषणों में यह मुद्दा गायब है। लगता है कि छोटे राज्यों का गठन चुनावी बयार
में कहीं उड़ गया है। बुंदेलखंड कांग्रेस जरूर इसे गरमाने की कोशिश कर रही
है।
-प्रो. सुरेंद्र प्रताप, महात्मा गांधी कांशी विद्यापीठ, वाराणसी
प्रदेश का बंटवारा नया मुद्दा नहीं है।
आजादी के तत्काल बाद ही यह मांग उठनी शुरू हो गईं थी। 1955 में पहले राज्य
पुनर्गठन आयोग के सदस्य डॉ. केएम पणिक्कर ने प्रदेश के विभाजन की जोरदार
वकालत की, लेकिन यह कभी जनांदोलन नहीं बना। डेढ़ दशक पहले उत्तराखंड को अलग
राज्य बनाने की मांग ने जोर पकड़ा तो हरित प्रदेश, पूर्वांचल और बुंदेलखंड
के नेता मुखर हो गए। चौधरी अजित सिंह, शतरुद्ध प्रकाश और बुंदेलखंड मुक्ति
मोर्चे के शंकर लाल मेहरोत्रा जैसे लोग एक साथ आए। यह साथ लंबा नहीं चल
सका, लेकिन कई संगठन छोटे राज्यों की मांग उठाते रहे।
मुख्यमंत्री
मायावती ने पंद्रहवीं विधानसभा के अंतिम सत्र में प्रदेश को पूर्वांचल,
पश्चिमी यूपी, अवध और बुंदेलखंड में बांटने का प्रस्ताव पारित कराकर सभी को
सकते में डाल दिया। विधानसभा में राज्य विभाजन का प्रस्ताव पारित होने के
बाद माना गया कि बसपा इसे ट्रंप कार्ड के रूप में इस्तेमाल करेगी।
विरोधियों को इस मुद्दे पर बैकफुट आना पड़ सकता है। कांग्रेस और भाजपा
नेताओं ने राज्य पुनर्गठन की मांग करनी शुरू कर दी थी।
राज्य
पुनर्गठन का प्रस्ताव पारित होने के दो माह बाद स्थिति बदली हुई है।
प्रदेश में चुनावी माहौल चरम पर है। तीन चरणों के मतदान के लिए नामांकन
पत्र दाखिल हो चुके हैं। सभी दलों के स्टार प्रचारक चुनावी जंग में कूद गए
हैं, लेकिन राज्य विभाजन का मुद्दा उठता नहीं दिख रहा है। न तो सत्ता पक्ष
और न ही विपक्षी नेता इस मुद्दे को तूल दे रहे हैं।
छोटे राज्यों के निर्माण का मुद्दा तो प्रासंगिक
है, लेकिन सत्ता की दौड़ में यह पीछे छूट गया है। चुनाव में सभी दलों का
मकसद जाति, धर्म और धनबल के बल पर सत्ता कब्जाना है। पूर्वांचल के गठन का
मुद्दा सपा के तो एजेंडे में ही नहीं है। इसकी वजह राजनीतिक है। मुलायम
सिंह को लगता है कि सपा को पश्चिम से ज्यादा समर्थन पूरब में मिलता है। अलग
राज्य बना तो ताकत कम हो जाएगी। जब तक जनांदोलन नहीं होगा, यह चुनावी
मुद्दा नहीं बनेगा।
आपको लग रहा है कि बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने
का मुद्दा हॉट नहीं है। यह सच है। बुंदेलखंड के लोगों की सोच सिर्फ पेट तक
सीमित है। 18 साल हमने बिना विकल्प के लड़ाई लड़ी है। पहली बार विकल्प लेकर
जनता के बीच जा रहे हैं। हम कछुआ चाल से चल रहे हैं।इसी से कामयाबी
मिलेगी। बुंदेलखंड में दबंगों की राजनीति है, हमें उन्हीं केबीच जगह बनानी
है। आप हमारे प्रत्याशियों के बारे में पता कीजिए, मुद्दे की अहमियत सामने आ
जाएगी।
-राजा बुंदेला, अध्यक्ष, बुंदेलखंड कांग्रेस
सच है कि छोटे राज्यों का गठन चुनावी मुद्दा नहीं
बन सका। पश्चिमी यूपी में जब तक पृथक राज्य के पक्ष में सामाजिक आंदोलन
खड़ा नहीं होगा, राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार इसका इस्तेमाल करते
रहेंगे। लोगों में हरित प्रदेश के प्रति सहानुभूति तो हैं, लेकिन यह उनकी
प्राथमिकता नहीं बन सका। सहानुभूति को संघर्ष तक ले जाने पर इस मुद्दे की
कोई अनदेखी नहीं कर सकेगा।
-मेजर (डाॅ.) हिमांशु प्रवक्ता, हरित प्रदेश संघर्ष समिति
पूर्वांचल
•क्षेत्रफल - 85844 वर्ग किलोमीटर
•आबादी - करीब 6 करोड़, 66 लाख
•जिले - 27
•प्रति किसान सालाना आय 4665 रुपए
पश्चिमी उत्तर प्रदेश
•क्षेत्रफल - 7000 वर्ग किलोमीटर
•जनसंख्या - करीब छह करोड़
•जिले - 26
•प्रति किसान सालाना आय 13103 रुपए
अवध प्रदेश
•क्षेत्रफल- लगभग 6000 वर्ग किमी
•जनसंख्या - करीब सवा 5 करोड़
•सभावित जिले -15
•प्रति व्यक्ति सालाना आय 9500 रुपये
बुंदेलखंड
•क्षेत्रफल - 29418 किलोमीटर
•जनसंख्या - करीब 1.10 करोड़
•जिले - 13 जिले (सात यूपी के और 6 मध्य प्रदेश के)
•प्रति किसान सालाना आय 6624 रुपए



